EDUCATION | BY: POLITICS FEVER DESK | UPDATED: AUGUST 20, 2026
देश में प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराने वाली प्रमुख एजेंसी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। परीक्षाओं में गड़बड़ी, तकनीकी खामियों या पर्चे रद्द होने के बाद केवल ‘री-एग्जाम’ (पुनः परीक्षा) करा देना ही पर्याप्त नहीं है। छात्रों का आर्थिक नुकसान, मानसिक तनाव और परीक्षा प्रणाली पर गिरते भरोसे को बहाल करना आज सबसे बड़ी प्रशासनिक और नीतिगत चुनौती बन चुका है।
Highlights
- सिर्फ री-एग्जाम काफी नहीं: परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित करने से परीक्षा की शुचिता का संकट खत्म नहीं होता, बल्कि छात्रों पर मानसिक और आर्थिक बोझ दोगुना हो जाता है।
- छात्रों की आर्थिक व मानसिक परेशानी: दोबारा परीक्षा केंद्र तक जाने का सफर, रहने-खाने का खर्च और लंबे इंतजार से युवाओं का भविष्य और करियर प्रभावित होता है।
- जवाबदेही का अभाव: प्रश्नपत्रों में खामियों, सिलेबस से बाहर के सवालों या प्रशासनिक चूकों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस जवाबदेही तय करने की मांग।
- पारदर्शिता और तकनीकी सुधार जरूरी: प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर आंसर-की जारी करने और परीक्षा केंद्र आवंटन तक पूरी प्रक्रिया में बुनियादी बदलाव की आवश्यकता।
मुख्य विचार एवं विश्लेषण
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश के लाखों युवाओं का भविष्य तय करने वाली केंद्रीय प्रवेश और पात्रता परीक्षाओं की विश्वसनीयता आज एक नाजुक मोड़ पर पहुंच गई है। जब भी किसी बड़े राष्ट्रीय स्तर के इम्तिहान में खामियां सामने आती हैं, तो जांच और परीक्षा रद्द करने का फैसला तो ले लिया जाता है, लेकिन इसके पीछे व्यवस्था से जुड़ी उन गहरी कमियों की अनदेखी कर दी जाती है जो बार-बार दोहराई जा रही हैं।
विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का मानना है कि परीक्षा सुधार का मतलब सिर्फ एक तारीख रद्द कर दूसरी तारीख देना नहीं है, बल्कि उस तंत्र को फूलप्रूफ बनाना है जिस पर करोड़ों छात्रों की उम्मीदें टिकी हैं।
री-एग्जाम का दोहरा दंश: छात्रों के सामने 3 बड़े संकट
1. आर्थिक और यात्रा का बोझ: भले ही एजेंसी दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त फॉर्म फीस न ले, लेकिन दूर-दराज के शहरों में बने सेंटर्स तक आने-जाने, होटल में ठहरने और यात्रा टिकटों का भारी खर्च खुद छात्रों और उनके परिवारों को वहन करना पड़ता है।
2. मानसिक थकान और करियर में देरी: महीनों की कड़ी मेहनत के बाद अचानक परीक्षा रद्द होने की खबर अभ्यर्थियों के मनोबल को तोड़ती है। रिजल्ट और काउंसलिंग में होने वाली देरी से पूरा एकेडमिक सत्र पिछड़ जाता है।
3. सिस्टम पर अविश्वास: बार-बार होने वाले विवादों से देश की सबसे बड़ी परीक्षण व्यवस्था की निष्पक्षता और साख पर आंच आती है।
जवाबदेही और सुधार का खाका
- परीक्षा सुधार केवल बयानों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाने अनिवार्य हैं:
- सख्त जवाबदेही फ्रेमवर्क: प्रश्नपत्र तैयार करने वाले पैनल, मॉडरेटर्स और परीक्षा केंद्रों के ऑडिट में चूक करने वाली एजेंसियों पर दंडात्मक कार्रवाई हो।
- होम डिस्ट्रिक्ट सेंटर प्राथमिकता: री-एग्जाम की स्थिति में परीक्षार्थियों को उनके नजदीकी शहर या गृह जिले में केंद्र चुनने की सुविधा दी जाए।
- समयबद्ध निवारण प्रणाली: आंसर-की और आपत्तियों के निस्तारण में महीनों का समय लगाने के बजाय पारदर्शी और तय समयसीमा वाली व्यवस्था लागू की जाए।